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An Indian perspective to Unicode and Localisation

जहां उपभोक्ता, वहां आईटीः हिंदी कैसे रहेगी पीछे?

भारत के संदर्भ में यदि कहें तो सूचना प्रौद्योगिकी के विभिन्न अनुप्रयोगों को हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में ढलना ही होगा। यह एक अनिवार्यता है। उनके लिए भले ही यह विवशता हो, किंतु यह अपरिहार्य है। उसकी वजह भी बहुत स्पष्ट है। और वह यह, कि हमारे पास संख्या बल है। हमारे पास पढ़े लिखे समझदार, किंतु अंग्रेजी की बजाय आज भी हिंदी को वरीयता देने वाले लोगों की संख्या भी करोड़ों में है।

By Balendu Sharma Dadhich बालेन्दु शर्मा दाधीच 19/08/07

सूचना प्रौद्योगिकी का उद्गम भले ही अमेरिका में हुआ हो, भारत के योगदान के बिना वह अस्तित्व में ही नहीं आ सकती थी। कंप्यूटर न क्वीन्स इंग्लिश जानता है और न फ्रेंच। वह तो सिर्फ अंकों की भाषा समझता है। वो भी सिर्फ दो अंकों की भाषा- एक तथा शून्य। और शून्य का अंक इस विश्व को भारत का योगदान है। शून्य न होता तो सूचना प्रौद्योगिकी न होती और यदि होती तो न जाने किस रूप में होती। न जाने कितनी सक्षम या पंगु होती।

गूगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एरिक श्मिट ने कुछ महीने पहले एक टिप्पणी करके जबरदस्त हलचल मचा दी थी कि आने वाले पांच से दस साल के भीतर भारत दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट बाजार बन जाएगा। कोई दूसरे या तीसरे नंबर का नहीं, बल्कि सबसे बड़ा, यानी पहले नंबर का बाजार। उन्होंने यह भी कहा है कि कुछ साल में इंटरनेट पर जिन तीन भाषाओं का दबदबा होगा, वे हैं- हिंदी, मंदारिन और अंग्रेजी।

श्मिट साहब के बयान से हमारे अपने उन लोगों की आंखें खुल जानी चाहिए जो यह मानते हैं कि कंप्यूटिंग का बुनियादी चरित्र अंग्रेजी है। यह धारणा सिरे से गलत है। कोई भी तकनीक,कोई भी डिजिटल युक्ति (इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस) भले ही वह कंप्यूटर हो या मोबाइल फोन, उपभोक्ता के लिए है, उपभोक्ता तकनीक के लिए नहीं। कोई भी तकनीक तभी सफल हो सकती है जब वह उपभोक्ता के अनुरूप अपने आप को ढाले। तकनीक तो एक माध्यम है। वह हमें निर्देशित नहीं करती। वह हमें आश्रित नहीं कर सकती कि मुझे इस्तेमाल करना है तो अंग्रेजी में करना होगा। तकनीक हमसे दिशानिर्देश प्राप्त करती है और हमारे द्वारा बताई गई सीमाओं में रहते हुए वह कितनी कुशलता के साथ हमारा काम आसान, सुव्यवस्थित और तेज बनाने में मदद करती है, इसी पर उसका अस्तित्व निर्भर करता है।

भारत के संदर्भ में यदि कहें तो सूचना प्रौद्योगिकी के विभिन्न अनुप्रयोगों को हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में ढलना ही होगा। यह एक अनिवार्यता है। उनके लिए भले ही यह विवशता हो, किंतु यह अपरिहार्य है। उसकी वजह भी बहुत स्पष्ट है। और वह यह, कि हमारे पास संख्या बल है। हमारे पास पढ़े लिखे समझदार, किंतु अंग्रेजी की बजाय आज भी हिंदी को वरीयता देने वाले लोगों की संख्या भी करोड़ों में है। यदि इन करोड़ों तक पहुंचना है, तो भले ही विश्व की कितनी ही बड़ी दिग्गज कंपनी हो, उसे भारतीयता, भारतीय भाषा और भारतीय परिवेश के अनुरूप ढलना ही होगा। इसे ही तकनीकी भाषा में लोकलाइजेशन कहते हैं। हमारे यहां भी कहावत है- जैसा देश, वैसा भेष। सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के मामले में भी यह बात शब्दशः लागू होती है।

सॉफ्टवेयर क्षेत्र की बड़ी कंपनियां अब नए बाजारों की तलाश में है, क्योंकि अंग्रेजी का बाजार ठहराव बिंदु के करीब पहुंच गया है। अंग्रेजी भाषी लोग सक्षम हैं और कंप्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट आदि का क्रय कर चुके हैं। अब उन्हें नए कंप्यूटरों की जरूरत नहीं। लेकिन हम हिंदुस्तानी अब कंप्यूटर खरीद रहे हैं, और बड़े पैमाने पर खरीद रहे हैं। हम हिंदुस्तानी अब इंटरनेट और मोबाइल तकनीकों को अपना रहे हैं और बड़े पैमाने पर अपना रहे हैं। आज संचार के क्षेत्र में हमारे यहां कितने अधिक उपभोक्ता मौजूद हैं। जून के आंकड़ों के अनुसार हमारे यहां बीस करोड़ मोबाइल टेलीफोन कनेक्शन हो गए हैं, ऊपर से चार करोड़ लैंडलाइन टेलीफोन कनेक्शन। हमारे यहां के वृद्धि के आंकड़े दुनिया के मार्केटिंग दिग्गजों को चौंका देते हैं। वहां तकनीकी कंपनियों के उपभोक्ता कुछ हजारों में बढ़ते हैं और हमारे यहां सीधे करोड़ों में वृद्धि होती है।

जो भी तकनीक आम आदमी से संबंधित है, उसमें असीम वृद्धि के लिए हमारे यहां अनन्त संभावनाएं हैं। हमारी अर्थव्यवस्था विकास की ओर अग्रसर है। हमारे यहां की शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार आया है। हमारे यहां तकनीक का प्रयोग करने वाले लोगों की संख्या में जैसे विस्फोट सा हुआ है। इन सब पर उनकी निगाहें हैं.. उनकी, यानी अंतरराष्ट्रीय आईटी कंपनियों की। क्योंकि इन सब तथ्यों में इस बात की संभावनाएं छिपी हैं कि हम दुनिया का सबसे बड़ा आईटी बाजार बनने वाले हैं। क्योंकि जैसा कि हमने ऊपर जिक्र किया, हम सीधे करोड़ों में बढ़ते हैं। कंप्यूटर लेने हैं तो करोड़ों लिए जाएंगे, इंटरनेट कनेक्शन लेने हैं तो करोड़ों लिए जाएंगे,मोबाइल लेने हैं तो करोड़ों लिए जाएंगे। इन हालात में दुनिया का कोई बाजार-दिग्गज या मार्केटिंग मेजर हमारी उपेक्षा करने की गलती नहीं कर सकता। और वह हमारी भाषा की उपेक्षा करने की गलती भी नहीं कर सकता। यदि उसे भी करोड़ों में बढ़ना है, तो उसे हिंदी को अपनाना होगा, हमें अंग्रेजी को नहीं...

वे अपनाने भी लगे हैं। मैं एक इंटरनेट पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम का संचालन करता हूं और पिछले कई वर्षों के संघर्ष और स्थायित्व के बाद हम उसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में सफल हुए हैं। ऐसी ही कुछ अन्य इंटरनेट आधारित परियोजनाएं जैसे कि वेबदुनिया, जागरण, नवभारत टाइम्स आदि कुख्यात डॉट कॉम बस्ट के प्रहार से बचते हुए आगे बढ़ने में सफल रही हैं। इन सबने खूब संघर्ष किया है, अनिश्चितताओं और कष्टों के बीच रहते हुए तकनीकी दुनिया में हिंदी के लिए मशक्कत की है। और आज स्थिति यह है कि अकेले प्रभासाक्षी पर होने वाले दैनिक हिट्स की संख्या सात लाख को पार कर गई है। पिछले दस सालों में किसी अंतरराष्ट्रीय आईटी कंपनी ने हिंदी इंटरनेट के क्षेत्र में दिलचस्पी नहीं दिखाई। लेकिन बड़ी दिलचस्प बात है कि अब जब हम सब संघर्ष के मार्ग से आगे बढ़कर आर्थिक लाभ की स्थिति में पहुंच रहे हैं तो यकायक अंतरराष्ट्रीय कंपनियां हिंदी के बाजार में कूद पड़ी हैं। उन्हें पता है भारतीय कंपनियों ने अपने परिश्रम से बाजार तैयार कर दिया है... अब हिंदी में इंटरनेट आधारित या सॉफ्टवेयर आधारित परियोजना लाना फायदे का सौदा है। तो उन्होंने भारत आना शुरू कर दिया है। चाहे वह याहू हो, चाहे गूगल हो या फिर एम.एस.एन। सब हिंदी में आ रहे हैं। ए.ओ.एल. हाल ही में भारत आई है। हो सकता है कुछ महीनों में वह भी हिंदी में उपलब्ध हो। माइक्रोसॉफ्ट के डेस्कटॉप उत्पाद हिंदी में आ गए हैं, आई.बी.एम. से लेकर सन माइक्रोसिस्टम और ओरेकल तक ने हिंदी को अपनाना शुरू कर दिया है। लिनक्स और मैकिन्टोश पर भी हिंदी आ गई है। इंटरनेट एक्सप्लोरर, नेटस्केप, मोजिला, ओपेरा जैसे इंटरनेट ब्राउजर हिंदी को समर्थन देने लगे हैं तो ब्लॉगर से लेकर वर्ड प्रेस तक ब्लॉगिंग के क्षेत्र में भी हिंदी आ गई है। आम कंप्यूटर उपयोक्ता के कामकाज से लेकर डेटाबेस तक में हिंदी उपलब्ध हो गई है। यह अलग बात है कि अभी भी हमें बहुत दूर जाना है, लेकिन एक बड़ी शुरूआत हो चुकी है और वह अवश्यंभावी थी।

बड़ा दिलचस्प संयोग है कि इधर यूनिकोड नामक एनकोडिंग प्रणाली, जिसने हिंदी को अंग्रेजी के समान ही सशक्त बना दिया है, कंप्यूटिंग के क्षेत्र में आई है और लगभग उसी समय आर्थिक सुधारों के अश्व पर सवार हमारी अर्थव्यवस्था छलांगें मार रही है। ऐसे में ठहराव बिंदु के निम्नतम तापमान पर बैठी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कारवां भारत और उसकी भाषाओं की दिशा में बढ़ रहा है। उन सबके भारत आने का स्वागत है क्योंकि भले ही उनकी मंशा सौ फीसदी वाणिज्यिक हो, उनके आने से हिंदी समृद्ध हो रही है। हिंदी में कंप्यूटर और कंप्यूटर में हिंदी का सपना साकार हो रहा है।

फिर भी, चुनौतियों की कमी नहीं है। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में मानकीकरण, या स्टैंडर्डाइजेशन आज भी एक बहुत बड़ी चुनौती है। यूनिकोड के माध्यम से हम मानकीकरण की दिशा में एक बहुत बड़ी छलांग मार चुके हैं। उसने हमारी बहुत सारी समस्याओं को हल कर दिया है। संयोगवश, यूनिकोड के मानकीकरण को भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों का जितना समर्थन मिला, उतना कीबोर्ड के मानकीकरण को नहीं मिला। भारत का आधिकारिक कीबोर्ड मानक इनस्क्रिप्ट है। यह एक बेहद मेधावी किस्म की, अत्यंत सरल और बहुत तीव्र ढंग से टाइप करने वाली कीबोर्ड प्रणाली है। मैंने जब पिछली गिनती की थी तो हमारे हिंदी में टाइपिंग करने के कोई डेढ़ सौ तरीके, जिन्हें तकनीकी भाषा में कीबोर्ड लेआउट्स कहते हैं, मौजूद थे। फोंटों की असमानता की समस्या का समाधान तो पास दिख रहा है लेकिन असंख्य कीबोर्डों की अराजकता का निदान निकट नहीं दिख रहा क्योंकि माइक्रोसॉफ्ट जैसे दिग्गज भी एमएस वर्ड जैसे अपने अनुप्रयोगों में अनेक प्रकार से टाइपिंग की व्यवस्था प्रदान कर रहे हैं। सवाल उठता है कि क्या सूचना प्रौद्योगिकी में हिंदी को जिस सुव्यवस्थित मार्ग पर आगे बढ़ाने का हम सबका लक्ष्य है, उसमें सिर्फ फोंट या टेक्स्ट एनकोडिंग का मानकीकरण पर्याप्त है? क्या कीबोर्ड का मानकीकरण एक अनिवार्यता नहीं है? ट्रांसलिटरेशन जैसी तकनीकों से हम लोगों को हिंदी के करीब तो ला रहे हैं लेकिन कीबोर्ड के मानकीकरण को उतना ही मुश्किल बनाते जा रहे हैं, दूर करते जा रहे हैं। यूनिकोड को अपनाकर भी, सही अर्थों में कहा जाए तो हम संपूर्ण मानकीकरण की बजाए, अर्ध-मानकीकरण तक ही पहुंच पाए हैं।

हिंदी में सूचना प्रौद्योगिकी को और गति देने के लिए राष्ट्रव्यापी स्तर पर सही ढंग से हिंदी कंप्यूटर टाइपिंग के प्रशिक्षण की चुनौती की ओर भी अब तक ध्यान नहीं दिया गया है। आज देश के छोटे-छोटे शहरों, कस्बों आदि में अंग्रेजी में कंप्यूटर सिखाने वाले शिक्षण संस्थान खुले हुए हैं, लेकिन हिंदी में टंकण या कंप्यूटर का प्रयोग सिखाने की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। यदि देश में निम्नतम स्तर पर लोगों को हिंदी में कंप्यूटर में काम करना सिखाया जाए तो संभवतः हिंदी कंप्यूटिंग से जुड़ी हुई बहुत सारी समस्याएं हल हो जाएं। फिलहाल लोग सिर्फ अंग्रेजी में सीखते हैं और बाद में तुकबंदियों के माध्यम से थोड़ा बहुत हिंदी में काम निकालते हैं। कीबोर्ड हार्डवेयर पर हिंदी की कुंजियों के अक्षर अंकित करने को ही लीजिए। यह एक बहुत छोटी सी, बुनियादी जरूरत है। लेकिन इतनी छोटी सी चीज के अभाव में लाखों लोग हिंदी टाइपिंग से दूर बने हुए हैं। भारत सरकार चाहे तो कीबोर्ड पर अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी के अक्षर अंकित करने का आदेश देकर इस समस्या का स्थायी समाधान निकाल सकती है।

यदि सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हिंदी को क्रांतिकारी शक्ति का रूप देना है, तो आम कंप्यूटर उपयोगकर्ता को बहुत सस्ती दरों पर सॉफ्टवेयर उपलब्ध कराए जाने की भी जरूरत है। साथ ही साथ वेबसाइटों के क्षेत्र में व्यापक स्तर पर हिंदी को अपनाना होगा। सिर्फ कुछ हिंदी पोर्टलों और वेबसाइटों भर से काम नहीं चलेगा। हमें समाचार और साहित्य के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी, जैसे कि शिक्षा, तकनीक, विज्ञान, ई-कॉमर्स, ई-शिक्षा, ई-प्रशासन आदि के क्षेत्रों में हिंदी वेबसाइटों को प्रोत्साहित करना होगा। इतना ही नहीं, आम व्यापारियों, संस्थाओं आदि की वेबसाइटें अंग्रेजी में ही हैं। ऐसी लाखों अंग्रेजी वेबसाइटों को हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में लाने की चुनौती को भी हल करना होगा।

बहरहाल, कहा जाता है कि चुनौतियों को पार करके ही स्थायी सफलता आती है। हिंदी के विकास में सूचना प्रौद्योगिकी, और सूचना प्रौद्योगिकी के विकास में हिंदी के बढ़ते प्रभाव को लेकर स्थितियां निरंतर बेहतर हो रही हैं। तकनीकी क्षेत्र में हिंदी के विकास को सरकार और कंपनियां भले ही करें या न करें, हमारे गांव-कस्बे का सामान्य नागरिक जरूर सुनिश्चित करेगा, क्योंकि आज की दुनिया में उपभोक्ता ही राजा है।

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