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An Indian perspective to Unicode and Localisation

हिंदी में अब आईटी आधारित सेवाओं का दौर चले

हिंदी के संदर्भ में सूचना तकनीक की दुनिया में एक बड़ा बदलाव लाने की जरूरत है। अब तक हम कम्प्यूटिंग और आईटी को बुनियादी तौर पर उत्पाद या प्रोडक्ट आधारित मानते रहे हैं। हिंदी को अब सेवा आधारित व्यवस्था, यानी सर्विस ओरिएंटेड आईटी की ओर भी दखल करना होगा।

By बालेन्दु शर्मा दाधीच Balendu Sharma Dadhich 27/01/07

हिंदी के संदर्भ में सूचना तकनीक की दुनिया में एक बड़ा बदलाव लाने की जरूरत है। अब तक हम कम्प्यूटिंग और आईटी को बुनियादी तौर पर उत्पाद या प्रोडक्ट आधारित मानते रहे हैं। हम कहते हैं कि माइक्रोसॉफ्ट का ऑफिस हिंदी उत्पाद आ गया या फिर रेड हैट लिनक्स आपरेटिंग सिस्टम नामक उत्पाद अब भारत की कई भाषाओं को समर्थन प्रदान कर रहा है। हिंदी को अब सेवा आधारित व्यवस्था, यानी सर्विस ओरिएंटेड आईटी की ओर भी दखल करना होगा।

सरकारी सेवाओं का कंप्यूटरीकरण करना और उन्हें हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराना आज की सर्वाधिक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इक्का-दुक्का राज्यों ने हालांकिई -गवर्नेंस औरई -एडमिनिस्ट्रेशन के क्षेत्र में काम किया है लेकिन कर्नाटक को छोड़कर बहुत कम स्थानों पर यह हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है। भारतीय रेलवे की आरक्षण व्यवस्था सेवा आधारित आईटी अनुप्रयोगों का शानदार उदाहरण है। यह अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी उपलब्ध है। आईटीसी कंपनी की तरफ से प्रवर्तितई -चौपाल आईटी आधारित एक शानदार सेवा है जो हिंदी ही नहीं, अनेक भाषाओं में उपलब्ध है। इसके माध्यम से किसान न सिर्फ विभिन्न उत्पादों के भाव जान सकते हैं बल्कि उन्हें बेच भी सकते हैं। केंद्र और राज्यों के हर मंत्रालय, हर विभाग और हर संस्थान को हिंदी में आईटी आधारित सेवाएं मुहैया करानी चाहिए। यानी कि अरबों-खरबों दस्तावेजों और लाखों तरह के कामों को अपनी भाषाओं में प्रस्तुत करना। जरा सोचिए, क्या हमारी जरूरत इंटरनेट और डेस्कटॉप अनुप्रयोगों तक सीमित है?

ई-कॉमर्स भी ऐसी ही सेवा आधारित व्यवस्था है जो अब भारत में भी लोकप्रिय हो रही है, मगर अंग्रेजी में। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में फिलहाल न रीडिफ जैसी ई कामर्स सेवाएं उपलब्ध हैं, न सिफी, इंडियाटाइम्स औरई बे जैसी। शेयर बाजार के क्षेत्र में इंडियाबुल्स और इंडियाइन्फोलाइन जैसी कंपनियां तो बैंकिंग के क्षेत्र में आ सीआ सीआ , आ डीबीआ , एचडीएफसी जैसे आधुनिक बैंक अपनीई ई-कामर्स आधारित और इंटरनेट बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध करा रहे हैं। मगर सब अंग्रेजी में। हिंदी कहीं नहीं है। बैंकिंग की बात छिड़ी है तो पासबुकों और एटीएम का भी ख्याल आता है। पंजाब नेशनल बैंक ने जरूर हिंदी और पंजाबी में एटीएम सेवा देकर सराहनीय काम किया है। बाकी सब अंग्रेजी में हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में लगातार महत्वपूर्ण विकास हो रहा है। ऑनलाइन कक्षाएं, ऑनलाइन परीक्षाएं, ऑनलाइन परिणाम आदि आईटी आधारित सेवाओं के दायरे में आती हैं लेकिन इन सुविधाओं को हिंदी में उपलब्ध होने में न जाने कितने वर्ष लगेंगे। हां, मैं इस संदर्भ में एक बार फिर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी माइक्रोसॉफ्ट का जिक्र करना चाहूंगा जिसने अपने नोलेज बेस यानी तकनीकी ज्ञान कोष का एक हिस्सा अब हिंदी में भी उपलब्ध करा दिया है। यानी माइक्रोसॉफ्ट के कुछ उत्पादों से संबंधित प्रश्नों की जानकारी आप हिंदी में भी प्राप्त कर सकते हैं।

दूरसंचार उद्योग के उफान का दौर है तो मोबाइल फोन में दी जाने वाली सेवाएं हिंदी में लाने की जरूरत है। हिंदी में एसएमएस जरूर शुरू हुआ है लेकिन जरा हिंदी में मौजूद इस सुविधा की तुलना अंग्रेजी में मौजूद सेवाओं से कीजिए! रेलवे और कुछ दूरसंचार कंपनियों ने टेलीफोन के माध्यम से स्वचालित ढंग से उपलब्ध कराई जाने वाली स्वचालित इनक्वायरी सेवा में अब हिंदी को भी जगह देना शुरू किया है। लेकिन ऐसे संस्थान मुश्किल से एकाध दर्जन हैं। हजारों या यूं कहें लाखों संस्थानों ने तो इस दिशा में सोचा भी नहीं।

वेबसर्विसेज में हिंदी

पिछले दो-तीन वर्षों में आईटी में वेबसर्विसेज नामक परिघटना ने खासी हलचल मचाई है। वेबसर्विसेज एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें कोई सॉफ्टवेयर या सर्विस प्रदान करने वाले डवलपर्स को हर काम खुद करने की जरूरत नहीं है। उसकी बजाए वे इंटरनेट के माध्यम से कहीं और उपलब्ध वेबसर्विस को अपने उत्पाद में एकीकृत या इंटेग्रेटेड कर लेते हैं। यह कमाल की परिकल्पना है। मिसाल के तौर पर, कोई कवि महोदय एक वेबसर्विस विकसित करें जो कि उनकी ताजातरीन कविताओं को सहेजती हो। यदि किसी तकनीकी व्यक्ति को विश्व में किसी भी स्थान पर अपने सॉफ्टवेयर या उत्पाद में ऐसी कविताएं शामिल करनी हों तो वह कविजी की वेबसर्विस का लाइसेंस लेकर ऐसा कर सकेगा। यानी कविजी जब भी अपनी वेबसर्विस में कोई नई कविता शामिल करेंगे तो वह स्वत: विश्व भर में उस उत्पाद के उपयोगकर्ताओं को भी प्राप्त हो जाएगी। कोई हिंदी विद्वान ऐसी ही एक वेबसर्विस शुरू कर सकते हैं जो कि हिंदी भाषा की त्रुटियां दूर करती हो। मुंबई स्टॉक एक्सचेंज ऐसी वेबसर्विस प्रदान कर सकता है जो कि शेयरों के ताजा भाव उपलब्ध कराती हो। कोई सॉफ्टवेयर कंपनी ऐसी वेबसर्विस ला सकती है जो अन्य फोंटों में टाइप की गई सामग्री को यूनिकोड में परिवर्तित कर दे। इसी तरह ऐसी भी वेबसर्विस हो सकती है जो मूल अंग्रेजी पाठ को हिंदी में अनूदित कर दे। कोई पंडितजी दैनिक राशिफल या व्रत त्योहार की वेबसर्विस दे सकते हैं तो हिंदी अखबार खबरों की वेबसर्विस शुरू कर सकता है। संभावनाएं अनन्त हैं और यह पूरी तरह से एक नया क्षेत्र, एक नई सोच है।

वेबसर्विसेज सिर्फ सेवा प्रदाता की ही वेबसाइट या उत्पाद के माध्यम से ही काम नहीं करतीं बल्कि विश्व में कहीं भी, कोई भी प्रोगामर या सॉफ्टवेयर डवलपर उनका प्रयोग एक पुर्जे के रूप में कर सकता है। यानी यदि एक हजार लोग अशोक चक्रधर जी की वेबसर्विस का लाइसेंस लेते हैं, और वे अपने उत्पादों की एक-एक हजार प्रतियां बेचते हैं तो अशोकजी की कविताएं हर समय दस लाख लोगों को उपलब्ध हो सकेंगी, जबकि अशोकजी ने ऐसा करने के लिए कोई प्रयास भी नहीं किया। यदि उन्हें अपनी किसी कविता में संपादन करना है तो उन्हें उन दस लाख लोगों को संपादित कविता भेजने की जरूरत नहीं है। चूंकि वे उनकी वेबसर्विस से डाइनेमिक रूप से संबद्ध हैं इसलिए उन सभी को स्वत: संपादित कविता प्राप्त हो जाएगी।

इंटरनेट की रफ्तार से कदम मिलाइए

हिंदी में बहुत से पोर्टल, वेबसाइट्स सामने आए हैं और उन्होंने आंकिक विभाजन (डिजिटल डिवाइड) को दूर करने तथा भारत को आईटी आधारित विश्वग्राम का महत्वपूर्ण सदस्य बनाने में अपना अहम योगदान दिया है। यहां हम यूनिकोड और हैक एनकोडेड फोंट्स के मुद्दे पर बात नहीं करेंगे और न ही संपूर्ण इंटरनेट की तुलना में हिंदी वेबसाइटों के अनुपात पर। मेरा फोकस यह है कि हम खबर, चुटकुले, लेख और साहित्य उपलब्ध कराने से आगे कब बढ़ेंगे? आप कहेंगे कि अभी तो इन क्षेत्रों में ही पर्याप्त काम नहीं हुआ है। हिंदी साहित्य और ज्ञान को इंटरनेट पर डालने की प्रक्रिया को जारी रहने दीजिए। लेकिन साथ ही साथ यह भी तो देखिए कि इंटरनेट की दुनिया कहां से कहां पहुंच रही है!

विश्व में अब वेब २.० की बात चल रही है। हो सकता है आपमें से कुछ ने एजाक्स टेक्नॉलॉजी का जिक्र भी सुना हो। वेब २.० यानी इंटरनेट आधारित सेवाओं और उत्पादों का लगभग उसी तरह काम करना जैसे वे इंटरनेट के माध्यम से नहीं चल रहे, बल्कि आपके कंप्यूटर पर ही इन्स्टाल्ड हैं। आपने गूगल के सर्च रिजल्ट्स देखे होंगे। कठिन से कठिन कीवर्ड पर आधारित सर्च रिजल्ट भी वह कुछ मिली-सैकन्ड में खोज लाता है। जीमेल को देखिए, वह उसी तेजी से काम करती है जैसे आपके कंप्यूटर पर मौजूद आउटलुक सॉफ्टवेयर कर रहा हो। ये वेब २.० पर आधारित उत्पाद हैं। गूगल की जबरदस्त सफलता के बाद अब क्या माइक्रोसॉफ्ट और क्या याहू, सभी वेब २.० को गले लगा चुके हैं। मगर हम इस मामले में कहां हैं? प्रयोगों को छोड़ दें तो मेरी नजर में ऐसा एक भी हिंदी पोर्टल या वेबसाइट नहीं है जो वेब २.० पर आधारित हो। हमारे पोर्टल तो दो-दो तीन-तीन मिनट में खुलते हैं। एक तो डायनेमिक फोंट के डाउनलोड होने में लगने वाला समय, दूसरे अंग्रेजी कोड पर बैठा बेचारा हिंदी कॉन्टेंट और तीसरे वही पुराने एएसपी स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज में लिखे पेज। उधर अपने ही हिंदुस्तानी पोर्टल रीडिफ को देखिए। यूआरएल लिखने के पांच सैकंड के भीतर रीडिफ का होमपेज खुल जाता है। यह वेब २.० का कमाल है।

हिंदी में वैरायटी लाने की जरूरत है। आईटी में हिंदी को शक्तिशाली बनाने की जरूरत है। नौकरी.कॉम, जीवनसाथी.कॉम, ओरकुट, बाजी,ई लांस, फ्रूगल, मैप्स, चैटिंग, मैसेंजर, मेल, सर्च, ब्लॉग, फोरम, ऑनलाइन वर्ड प्रोसेसर, ऑन लाइन आपरेटिंग सिस्टम, एक्सएमएल फीड्स, मशीन ट्रांसलेशन, ओप्टिकल कैरेक्टर रिकोग्निशन,ई आरपी, डेटाबेस, प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेज, मानव-कंप्यूटर संपर्क, स्पीच टेक्नालाजी वगैरह वगैरह.... हमें ये सब चाहिए और इनके अलावा भी बहुत कुछ चाहिए। सब हिंदी में।

(अंतरराष्ट्रीय हिंदी उत्सव के दौरान हिंदी और टेक्नालॉजी विषय पर दिए गए बालेन्दु दाधीच के भाषण के अंश)।

जहां उपभोक्ता, वहां आईटीः हिंदी कैसे रहेगी पीछे?

कस्बों-गांवों तक कब पहुंचेगी 'असली' सूचना क्रांति?

हिंदी में अब बड़े आईटी प्रोजेक्ट लाने की तैयारी कीजिए

वेबसाइट हिंदी में है तो डोमेन नेम अंग्रेजी में क्यों?

हिंदी को कीबोर्डों के झंझट से छुटकारा कब मिलेगा?

भूमंडलीकरण में आईटी का योगदान है यूनिकोड

मीडिया में यूनिकोड वेबसाइटों तक सीमित क्यों रहे?

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