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An Indian perspective to Unicode and Localisation

हिंदी में अब बड़े आईटी प्रोजेक्ट लाने की तैयारी कीजिए

आईटी के संदर्भ में हमने हिंदी में अभी तो सिर्फ जागरूकता पैदा की है, कंप्यूटर और इंटरनेट के हिंदीभाषी यूजर भर पैदा किए हैं। लेकिन क्या हिंदीवालों की नियति सिर्फ यूजर बनकर रहने की है? कम से कम मैं यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हूं। हमने सिर्फ हवाई पट्टी तैयार की है। अब हमें उड़ान भरने की दिशा में सोचना चाहिए।

By बालेन्दु शर्मा दाधीच Balendu Sharma Dadhich 27/01/07

सूचना प्रौद्योगिकी बहुत तेजी से आगे बढ़ता हुआ क्षेत्र है और हिंदी में यूनिकोड का समर्थन आए आठ साल बीत जाने के बाद भी हम इसे पूरी तरह लागू नहीं कर सके हैं। हिंदी को आईटी की भाषा बनाने के संदर्भ में हमारी चिंताओं का केंद्र अभी भी यूनिकोड तक ही सिमटा है। हमें कई वर्ष पहले ही इन बुनियादी मुद्दों से आगे बढ़ जाना चाहिए था। अभी भी हम हिंदी टेक्स्ट का कंप्यूटर में स्टोरेज करने के तरीकों, फोंट संबंधी समस्याओं और अनेकानेक हिंदी कीबोर्डों की अराजकता से परेशान हैं। आज भी हम जब आईटी के क्षेत्र में हिंदी की प्रगति की बात करते हैं तो हिंदी वेबसाइटों और हिंदी के डेस्कटॉप एप्लीकेशनों, ऑफिस सॉफ्टवेयर आदि का गुणगान कर खुश हो लेते हैं। बहरहाल, यूनिकोड के रूप में डेटा को सहेजना, हिंदी के दस्तावेज टाइप कर प्रिंट आउट लेना और इंटरनेट पर हिंदी में खबरें या साहित्य पढ़ लेना मात्र ही प्रौद्योगिकी नहीं है। यह तो प्रौद्योगिकी के थोड़े से अनुप्रयोग हैं। यह हमारा गंतव्य नहीं है, यह तो सफर की शुरूआत है।

हिंदी में यूनिकोड को सर्वव्यापी टेक्स्ट एनकोडिंग और इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड लेआउट को सर्वमान्य टाइपिंग पद्धति के रूप में मान्यता देने पर अब कोई विवाद नहीं है। डेटा के इनपुट और भंडारण के लिहाज से ये दोनों आदर्श तकनीकें हैं और सिर्फ हिंदी ही नहीं, बल्कि सभी भारतीय भाषाएं जितनी जल्दी इन्हें अपनाती हैं उतना ही श्रेयष्कर होगा। यूनिकोड अब मुख्यधारा बन रहा है और जो लोग अब तक उससे दूर हैं वे वास्तव में बहुत सारे अवसरों से दूर होते जा रहे हैं। यूनिकोड न अपनाने वाले बहुत से संस्थानों और लोगों के पास कई तर्कसंगत और व्यावहारिक कारण हैं। लेकिन इस बात का अहसास उन्हें भी है कि डेटा की न्यूनतम इकाई के रूप में और इनपुट, प्रोसेसिंग, स्टोरेज, आउटपुट और ट्रांसफर में बेहतरीन परिणामों के लिहाज से अंतत: उन्हें भी यूनिकोड अपनाना ही होगा। आइए, अब यूनिकोड से आगे की कुछ सोचें।

हम हिंदीवाले आज भी अपने आपको कंप्यूटर के यूजर के रूप में ही देखते हैं। इंटरनेट औरई मेल का प्रयोग छोड़ दें तो हम आज भी कंप्यूटर को बहुत हद तक एक आधुनिक टाइपराइटर के रूप में देखते हैं। आखिर क्यों हम खुद को सिर्फ एक यूजर समझते हैं, सॉफ्टवेयर डवलपर, सोल्यूशन आर्किटेक्ट या सर्विस प्रोवाइडर क्यों नहीं? आखिर क्यों हम टेबल के सिर्फ इस ओर बैठकर सोचते हैं, दूसरी ओर क्यों नहीं?

जी हां, अब तक हिंदी में जितना भी काम हुआ है, वह तो इमारत बनने से पहले सिर्फ जमीन समतल करने वाला काम है? अभी इमारत बनने की तो शुरूआत भी नहीं हुई है। अभी तो हमने सिर्फ जागरूकता पैदा की है, कंप्यूटर और इंटरनेट के हिंदीभाषी यूजर भर पैदा किए हैं। लेकिन क्या हिंदीवालों की नियति सिर्फ यूजर बनकर रहने की है? कम से कम मैं यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हूं। हमने सिर्फ हवाई पट्टी तैयार की है। अब हमें उड़ान भरने की दिशा में सोचना चाहिए। हिंदी को अगर वास्तव में आईटी की दुनिया में प्रतिष्ठित करना है तो अब हमें कॉन्टेंट क्रिएशन और कॉन्टेन्ट प्रेजेंटेशन से आगे बढ़ने के बारे में सोचना चाहिए। आईटी की दुनिया में एक जुमला काफी इस्तेमाल होता है कि इस उत्पाद में हिंदी समर्थन उपलब्ध है। मेरा कहना है कि वह उत्पाद हिंदी का सिर्फ समर्थन क्यों करे, वह पूर्णत: हिंदी आधारित उत्पाद क्यों न हो?

कॉन्टेन्ट से आगे बढ़ने की जरूरत

अंग्रेजी पर निर्भरता सिर्फ कॉन्टेन्ट तक ही सीमित नहीं है। सूचना प्रौद्योगिकी के जिस रूप को हम जानते हैं वह वास्तव में कदम-कदम पर अंग्रेजी पर आश्रित है। विंडोज से लेकर रेड हैट और मैकिन्टोश से लेकर सोलारिस तक, आपरेटिंग सिस्टम्स का ही उदाहरण लीजिए। भले ही हम उन्हें एक हिंदी इंटरफेस या मुखावरण दे दें, यह सिर्फ एक मुखौटा ही है क्योंकि आपरेटिंग सिस्टम के भीतर तो सब अंग्रेजी में ही है। हिंदी में काम करने के लिए इस्तेमाल होने वाला हर सॉफ्टवेयर भी वास्तव में अंग्रेजी में बना हुआ है। सिर्फ फोंट और इंटरफेस हिंदी के हैं। जिन हिंदी मेन्यूज और हिंदी फाइलनामों को देखकर हम खुश हो जाते हैं वास्तव में उनमें प्रयुक्त हिंदी पूरे कंप्यूटर में प्रयुक्त अंग्रेजी की दशमलव एक प्रतिशत भी नहीं है। यहां मेरा उद्देश्य हिंदी में अब तक हुए जबरदस्त और महत्वपूर्ण कार्य की उपेक्षा करने का नहीं है। मेरा उद्देश्य आपको यह बताना है कि सूचना प्रौद्योगिकी में हिंदी की यात्रा अभी शुरू ही हुई है।

आखिर हिंदी आईटी में कुछ और गहराई तक क्यों नहीं जा सकती? हिंदी में प्रोग्रामिंग या सॉफ्टवेयरों का विकास क्यों नहीं हो सकता? हिंदी में प्रोग्रामिंग से मेरा तात्पर्य उन कमांडों से है जिन्हें लिखने से सॉफ्टवेयर तैयार होता है। उदाहरण के लिए सी प्लस-प्लस नामक कंप्यूटर भाषा में जब हम अंग्रेजी में Printf नामक कमांड लिखकर आगे कोई टिप्पणी करते हैं तो कंप्यूटर स्वत: उस टिप्पणी को स्क्रीन पर प्रदर्शित करता है। वेब पेजों का निर्माण करते समय हम अंग्रेजी में कई तरह के टैग लिखते हैं जैसे कि HTML,Title,Body,Span,Div डिव आदि। यह उन प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेज में काम करने की अनिवार्यता है। मेरा सवाल है कि जो देश विश्व में आईटी के क्षेत्र में सर्वोच्च स्तर तक पहुंच चुका है, उसकी अपनी कंप्यूटर लैंग्वेजेज क्यों नहीं हो सकतीं? ऐसी कंप्यूटर लैंग्वेजेज जिनमें कमांड, कीवर्ड आदि सभी हिंदी में हों। जैसे कि लिखो, प्रिंट छोड़ो आदि। मैं एक बार फिर स्पष्ट कर दूं कि मैं सॉफ्टवेयरों में उपलब्ध मेन्यूज की बात नहीं कर रहा हूं। मैं उस कंप्यूटर भाषा की बात कर रहा हूं जो सॉफ्टवेयरों का निर्माण करने के लिए कंप्यूटर प्रोग्रामरों द्वारा प्रयुक्त की जाती है। वैसी ही जैसी कि Visual Basic, Java, C, C++ आदि हैं। विश्व की अनेक भाषाओं ने यह क्षमता प्राप्त कर ली है।

जरा सोचिए कि यदि एक हिंदुस्तानी कंप्यूटर लैंग्वेज विकसित हो तो सूचना क्रांति कहां से कहां पहुंच जाएगी। तब देश का वह युवक भी सॉफ्टवेयर विकसित करने में सक्षम हो जाएगा जो अंग्रेजी नहीं जानता। तब सही अर्थों में भारत में सूचना क्रांति होगी जब गांव और कस्बों से प्रतिभावान कंप्यूटर विशेषज्ञ और सॉफ्टवेयर निर्माता सामने आएंगे।

देसी उपयोक्ताओं के लिए अनुप्रयोग

जैसा कि मैंने कहा, इसके लिए हमें टेबल के दूसरी ओर जाकर, यानी सेवा ग्रहणकर्ता के रूप में नहीं बल्कि सेवा प्रदाता के रूप में सोचने की जरूरत है। लेकिन इस तरह की भाषाओं का विकास कौन करेगा? हमारे देश में बहुत बड़ी-बड़ी आईटी कंपनियां मौजूद हैं लेकिन उनकी सभी सेवाएं और उत्पाद विदेशोन्मुखी हैं। क्या इन्फोसिस, विप्रो, सत्यम और टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज ने भारतीय भाषाओं में कोई सॉफ्टवेयर या वेब अनुप्रयोग बनाए हैं? भारतीय भाषाएं भी छोड़ दीजिए, क्या उन्होंने अंग्रेजी में भी आम उपयोक्ता के लिए निरंतर प्रयोग के कोई सॉफ्टवेयर बनाए हैं? भारत की सबसे बड़ी आईटी कंपनियों की घरेलू बाजार और घरेलू कंप्यूटर उपयोक्ता में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनकी दिलचस्पी सिर्फ उन्हीं ऑर्डरों में है जिनमें मोटी रकम प्राप्त होती है। यदि वे भारत में कोई उत्पाद या सेवा प्रदान करती भी हैं तो सिर्फ केंद्र या राज्य सरकारों, बैंकों आदि के लिए। आखिर क्यों इतनी बड़ी आईटी शक्ति होने के बावजूद हमें हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में सॉफ्टवेयरों के विकास के लिए विदेशी कंपनियों का मुंह ताकना पड़ता है? आज भी हिंदी का सर्वश्रेष्ठ ऑफिस अनुप्रयोग माइक्रोसॉफ्ट का है और हिंदी का सर्वश्रेष्ठ सर्च इंजन भी गूगल ही है। जरूरत है कि हम अपनी आईटी कंपनियों की अद्वितीय क्षमता, मेधा और शक्ति का प्रयोग सिर्फ दूसरों के हित में ही नहीं, बल्कि अपने लोगों को तकनीकी रूप से सशक्त बनाने में भी करें।

हिंदी को कामचलाऊ वेबसाइट्स नहीं चाहिए। हिंदी को कामचलाऊ सॉफ्टवेयर भी नहीं चाहिए और सेवाएं भी। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है और विश्व की दूसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा। इंटरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या के लिहाज से हिंदी का नंबर चौथा है। ऐसी भाषा को न तो किसी से पिछड़ना चाहिए और न ही किसी की नकल करते हुए आगे बढ़ना चाहिए। हिंदी वालों को प्रो-एक्टिव होने की जरूरत है। हमें ढिलाई से चलने की नहीं बल्कि कमांडो कार्रवाई करने की जरूरत है। हिंदी में नए और क्रांतिकारी सोच वाले लोग चाहिए। मुझे समझ में नहीं आता कि जब कंप्यूटर सिर्फ अंकों की भाषा को समझता है तो फिर हिंदीभाषियों के कंप्यूटर में अंग्रेजी होनी ही क्यों चाहिए? पूर्णत: हिंदी आधारित, हिंदी भाषी, हिंदी के ढंग से काम करने वाले, अंग्रेजी की बैसाखी से पूरी तरह मुक्त कंप्यूटर का सपना न जाने कब साकार होगा।

(अंतरराष्ट्रीय हिंदी उत्सव के दौरान हिंदी और टेक्नालॉजी विषय पर दिए गए बालेन्दु दाधीच के भाषण के अंश)।

जहां उपभोक्ता, वहां आईटीः हिंदी कैसे रहेगी पीछे?

कस्बों-गांवों तक कब पहुंचेगी 'असली' सूचना क्रांति?

हिंदी में अब आईटी आधारित सेवाओं का दौर चले

वेबसाइट हिंदी में है तो डोमेन नेम अंग्रेजी में क्यों?

हिंदी को कीबोर्डों के झंझट से छुटकारा कब मिलेगा?

भूमंडलीकरण में आईटी का योगदान है यूनिकोड

मीडिया में यूनिकोड वेबसाइटों तक सीमित क्यों रहे?

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