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कस्बों-गांवों तक कब पहुंचेगी 'असली' सूचना क्रांति?

सूचना प्रौद्योगिकी में भारत की प्रभावशाली सफलता के पीछे भारतीय युवकों के एक बहुत छोटे हिस्से का योगदान है। ये वे युवक हैं जो अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त हैं, आर्थिक दृष्टि से अपेक्षाकृत बेहतर परिवारों से आते हैं और मझौले या बड़े शहरों में रहते हैं। उनसे कई गुना अधिक युवक आज भी सूचना प्रौद्योगिकी के मायालोक से अछूते हैं और इस उद्योग के विकास में कोई भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं हैं।

By बालेन्दु शर्मा दाधीच Balendu Sharma Dadhich 22/01/07

विश्व भर में सूचना क्रांति को नई दिशा देने में भारतीय इंजीनियरों और कंप्यूटर विशेषज्ञों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत का जो दबदबा है उसे देखते हुए विश्व के लोगों में यही धारणा बनती है कि भारत के अधिकांश शिक्षित युवा आईटी के क्षेत्र में अच्छा-खासा ज्ञान रखते होंगे। हालांकि वास्तव में ऐसा नहीं है। सूचना प्रौद्योगिकी में भारत की प्रभावशाली सफलता के पीछे भारतीय युवकों के एक बहुत छोटे हिस्से का योगदान है। ये वे युवक हैं जो अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त हैं, आर्थिक दृष्टि से अपेक्षाकृत बेहतर परिवारों से आते हैं और मझौले या बड़े शहरों में रहते हैं। उनसे कई गुना अधिक युवक आज भी सूचना प्रौद्योगिकी के मायालोक से अछूते हैं और इस उद्योग के विकास में कोई भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं हैं।

ये वे युवक हैं जो या तो छोटे शहरों, कस्बों या गांवों में रहते हैं या फिर आर्थिक दृष्टि से अपेक्षाकृत कमजोर परिवारों के सदस्य हैं और जिनकी शिक्षा-दीक्षा अंग्रेजी माध्यम के स्कूल-कॉलेजों में नहीं हुई है। वे अंग्रेजी में काम करने और इस भाषा में बात करने में परेशानी महसूस करते हैं। हालांकि उनमें से लाखों युवक बहुत मेधावी और प्रतिभावान हैं लेकिन अंग्रेजी उनकी कमजोरी है। भारत में अंग्रेजी न जानने वालों की संख्या देश की कुल आबादी की ९५ फीसदी है। ये सभी वे लोग हैं जो अंग्रेजी भाषा को अपने सामाजिक या व्यावसायिक जीवन की अनिवार्यता नहीं मानते। ये लोग अमेरिका, रूस और कुछ यूरोपीय देशों की कुल जनसंख्या से भी अधिक हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि अगर देश के करोड़ों गैर अंग्रेजीभाषी युवकों को भी सूचना क्रांति में योगदान देने का मौका मिले तो इस क्षेत्र में हम और कितने आगे बढ़ सकते हैं?

ऐसा वाकई हो सकता है यदि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में प्रोग्रामिंग (कंप्यूटर सॉफ्टवेयरों के निर्माण की प्रक्रिया) संभव हो जाए। यहां हमारा आशय हिंदी में उपलब्ध सॉफ्टवेयरों या आपरेटिंग सिस्टम्स से नहीं है बल्कि सॉफ्टवेयर निर्माण में इस्तेमाल होने वाली कंप्यूटर लैंग्वेज के हिंदीकरण या देसीकरण से है। फिलहाल सभी प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेज अंग्रेजी पर आधारित हैं और उनमें इस्तेमाल होने वाले शब्द, संकेत और कीवर्ड अंग्रेजी में हैं। हालांकि उनमें प्रयुक्त अंग्रेजी कोई बहुत मुश्किल नहीं है लेकिन अंग्रेजी से सशंकित रहने वाले युवाओं और पूरी तरह भारतीय भाषाओं में शिक्षा प्राप्त छात्रों को प्रोग्रामिंग से दूर रखने के लिए वही पर्याप्त है।

कुछ लोग कहेंगे कि हिंदी में प्रोग्रामिंग लैंग्वेज का निर्माण कैसे संभव है? वे इसे 'अव्यावहारिक परिकल्पना' करार देंगे। लेकिन यह सचमुच असंभव नहीं है। कारण यह कि कंप्यूटर के लिए तो अंग्रेजी भी एक पराई भाषा है। कंप्यूटर सिर्फ अंकों की भाषा जानता है। उसे अंग्रेजी में काम करने लायक बनाने के लिए हमें अंग्रेजी के अक्षरों को कुछ विशेष अंकों में बदलकर पेश करना होता है। यही काम हिंदी के अक्षरों के साथ भी किया जा सकता है। अंग्रेजी की कंप्यूटर लैंग्वेजेज का स्थानीयकरण या देसीकरण करना भी असंभव नहीं है। इसी तरह, अंग्रेजी कंप्यूटर लैंग्वेजेज के ऊपर एक भारतीय भाषाओं की परत (लेयर) या इंटरफेस बनाकर, बिना कोई बहुत अधिक परिश्रम किए, भारतीय भाषाओं में प्रोग्रामिंग का रास्ता निकाला जा सकता है। उस स्थिति में यह होगा कि प्रोग्रामर भारतीय भाषा में प्रोग्रामिंग करेगा और बाद में कंप्यूटर उसके लिखे कोड को अंग्रेजी आधारित प्रोग्रामिंग लैंग्वेज में बदल देगा।

विश्व के कई देशों में प्रोग्रामिंग को अंग्रेजी के वर्चस्व से मुक्त कराने के सफल प्रयोग हो चुके हैं। वहां विकसित की गई कुछ प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेज में तो स्थानीय भाषाओं के कीवर्ड का इस्तेमाल किया जाता है जबकि कुछ ऐसी हैं जिनमें अंग्रेजी आधारित प्राकृतिक भाषा अनुकूलन (नैचुरल लैंग्वेज कम्पेटिबिलिटी) का त्याग कर दिया गया है।

पिछले कुछ वर्षों में अनेक प्रमुख आईटी कंपनियां अपने सॉफ्टवेयर उत्पादों के इंटरफेस (मेन्यू, बटन, डायलॉग बॉक्स आदि) का देसीकरण कर चुकी हैं। माइक्रोसॉफ्ट, सन माइक्रोसिस्टम आदि के कुछ लोकप्रिय ऑफिस उत्पाद अब काफी हद तक हिंदीकृत या भारतीय भाषाकृत हो चुके हैं। इनसे आम कंप्यूटर उपयोगकर्ता को तो लाभ हो रहा है लेकिन कंप्यूटर विशेषज्ञ और कंप्यूटर सॉफ्टवेयर निर्माण के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को नहीं। हो सकता है कि कुछ वर्ष बाद प्रोग्रामिंग में इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयरों, मसलन विजुअल स्टूडियो और वेबस्फेयर, आदि का इंटरफेस भी हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हो जाए। बहरहाल, पूरी तरह हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के कीवर्ड्स पर आधारित प्रोग्रामिंग लैंग्वेज सूचना क्रांति को और भी निचले स्तर तक ले जाने में मदद कर सकती है। वह स्वयं सॉफ्टवेयर विकास पद्धति का ही देसीकरण या स्थानीयकरण होगा।

इस अवधारणा को बेहतर ढंग से समझने के लिए C और C++ जैसी प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेज का उदाहरण लेते हैं। इन भाषाओं में काम करने वाले प्रोग्रामर को कंप्यूटर स्क्रीन पर डेटा प्रदर्शित करने के लिए अंग्रेजी में Printf.. और Cout ... जैसी कमांड्स का प्रयोग करना होता है। यदि हिंदी आधारित कोई प्रोग्रामिंग लैंग्वेज विकसित की जाती है तो उसमें 'दिखाओ' या 'मुद्रित करो' जैसे कीवड्र्स का प्रयोग किया जा सकता है। हिंदी में अभिव्यक्ति और कामकाज करने में बेहतर महसूस करने वाले व्यक्ति के लिए इससे प्रोग्रामिंग काफी आसान हो जाएगी।

आज विश्व के कुछ देशों में जो गैर-अंग्रेजी प्रोग्राामिंग लैंग्वेजेज प्रचलित हैं उनमें लेक्सिको (स्पेनिश आधारित), एहुई (कोरियन), साको (पोलिश भाषा आधारित), रैपिरा (रूसी), एरलोगो (अरबी) आदि शामिल हैं। ये भाषाएं न सिर्फ गैर अंग्रेजी भाषियों को सॉफ्टवेयर विकास का वैकल्पिक मंच और माध्यम प्रदान करती हैं बल्कि ये छात्रों के बीच प्रोग्रामिंग को लोकप्रिय बनाने में भी बेहद उपयोगी सिद्ध होती हैं। 'लोगो' और 'बेसिक' जैसी कंप्यूटर लैंग्वेजेज विश्व की कई गैर-अंग्रेजी भाषाओं में अनूदित की जा चुकी हैं। इस काम में उन स्वयंसेवी सॉफ्टवेयर डेवलपर्स का महत्वपूर्ण हाथ है जो अपने उत्पादों को ओपन सोर्स व्यवस्था के तहत विकसित और वितरित करते हैं।

भारत में, जहां ओपन सोर्स प्रोग्रामिंग और कंप्यूटिंग अन्य देशों जितनी लोकप्रिय नहीं है, भारतीय भाषाओं पर आधारित कंप्यूटर लैंग्वेजेज के विकास की दिशा में नाममात्र का ही काम हुआ है। एकाध सॉफ्टवेयर ड़वलपर्स ने बच्चों को प्रोग्रामिंग सिखाने में इस्तेमाल होने वाली कंप्यूटर लैंग्वेज 'लोगो' को स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध कराया है। कोलकाता में आधारित डवलपर अभिषेक चौधरी ने जरूर इस क्षेत्र में ठोस काम किया है। उन्होंने 'हिंदवी' नाम से एक प्रोग्रामिंग प्लेटफार्म विकसित किया है जो फिलहाल हिंदी और बंगला भाषाओं में प्रोग्रामिंग की सुविधा प्रदान करता है। इसका प्रयोग बच्चों को उनकी मातृभाषा में प्रोग्रामिंग सिखाने के लिए तो किया ही जा सकता है, श्री चौधरी का दावा है कि इसे व्यावसायिक आधार पर प्रोग्रामिंग के लिए भी प्रयुक्त किया जा सकता है। हिंदवी के माध्यम से हिंदी और बंगला भाषा के प्रोग्रामर अपनी ही भाषाओं के कीवड्र्स का प्रयोग करते हुए सी, सी प्लस प्लस, लेक्स, वा एसीसी, जावा और असेंबली लैंग्वेजेज में प्रोग्रामिंग कर सकते हैं। यह प्लेटफार्म ओपन सोर्स लाइसेंसिंग के तहत नि:शुल्क उपलब्ध है। इसी तरह, यूबी पवनज ने लोगो का कन्नड भाषाई संस्करण तैयार किया है।

बहरहाल, हिंदवी को छोड़कर भारत में हिंदी और अन्य भाषाओं पर आधारित प्रोग्रामिंग लैंग्वेजेज के विकास का काम प्रारंभिक अवस्था में ही है। क्या कोई बड़ी कंपनी इस ओर ध्यान देकर सूचना क्रांति को भारत के छोटे शहरों और गांवों तक ले जाने की पहल करेगी?

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