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An Indian perspective to Unicode and Localisation

हिंदी को कीबोर्डों के झंझट से छुटकारा कब मिलेगा?

हिंदी में कोई एक-दो नहीं, पचासों तरह के कीबोर्ड लेआउट्स मौजूद हैं। एक तो सैंकड़ों तरह के अलग-अलग एनकोडिंग वाले हिंदी फोंट्स के कारण हिंदी कंप्यूटर उपयोगकर्ता पहले ही बड़ी उलझन के शिकार हैं, ऊपर से इन कीबोर्ड लेआउट्स ने उनकी समस्या को कई गुना बढ़ा दिया है।

By बालेन्दु शर्मा दाधीच Balendu Sharma Dadhich 22/09/06

सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी एक प्रमुख वेबसाइट के संपादक से हिंदी कंप्यूटिंग के बारे में बातचीत के दौरान जब मैंने कहा कि हिंदी में सिर्फ फोंट की ही नहीं बल्कि कीबोर्डों की बहुतायत भी बहुत बड़ी समस्या है तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। भला कीबोर्ड अलग-अलग कैसे हो सकते हैं और टाइपिंग के एक से अधिक तरीके कैसे संभव हैं? चूंकि वे कई सौ किलोमीटर दूर थे इसलिए उनके सामने हिंदी कीबोर्डों की 'समृद्ध परंपरा' का प्रदर्शन कर पाना संभव नहीं था, इसलिए मैंने बड़ी मुश्किल से चित्रों के माध्यम से सारी कहानी उन्हें लिखकर भेजी। इसके जवाब में उनका उत्तर आया कि भैया, यह सब क्या है? आईटी कंपनियां हिंदी कंप्यूटिंग की समस्याओं को सुलझा रही हैं कि उन्हें और अधिक उलझाती जा रही हंै?

वास्तव में अंग्रेजी में काम करने वाला कोई व्यक्ति शायद ही हिंदी कंप्यूटिंग में प्रचलित इस 'अनूठी सुविधा' को समझ पाए क्योंकि उसमें टाइप करने का बस एक ही तरीका है। यह वही तरीका है जो पहले टाइपराइटर पर चला करता था। चाहे आप विंडोज में काम करें, या मैकिन्टोश में या फिर लिनक्स में, अंग्रेजी टाइपिंग का तरीका वही रहेगा। विश्व में आप कहीं भी जाएं, अंग्रेजी में टाइप करने का तरीका यही रहेगा। कारण, अंग्रेजी में टाइपिंग की पद्धति मानकीकृत (स्टैंडर्डाइज्ड) है और उसका पालन किए बिना आप कंप्यूटर पर काम ही नहीं कर पाएंगे। हिंदी में ऐसा नहीं है। यहां कीबोर्ड पर किस की को दबाने से कौनसा अक्षर टाइप होगा, यह बात आपके कंप्यूटर या सॉफ्टवेयर में चुने गए कीबोर्ड लेआउट पर निर्भर करती है। यदि आपने रेमिंगटन कीबोर्ड चुना हुआ है तो कीबोर्ड की 'एल' बटन को दबाने पर 'स' अक्षर टाइप होगा, जबकि इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड का प्रयोग करने पर 'त' और ट्रांसलिटरेशन कीबोर्ड का इस्तेमाल करने पर 'ल' अक्षर।

हिंदी में को एक-दो नहीं बल्कि पचासों अलग-अलग तरह के कीबोर्ड लेआउट उपलब्ध हैं। एक तो सैकड़ों तरह के अलग-अलग एनकोडिंग वाले हिंदी फोंट (जो एक ही वाक्य को अलग-अलग ढंग से स्क्रीन पर डिस्प्ले करते हैं) के कारण हिंदी कंप्यूटर उपयोगकर्ता पहले ही बड़ी उलझन का शिकार है, ऊपर से इन कीबोर्ड लेआउट्स ने उसकी समस्या को क गुना बढ़ा दिया है। कुछेक कीबोर्ड लेआउट्स जो मेरी नजर से गुजरे, वे हैं-

१. टाइपराइटर-रैमिंगटन
२. टाइपराइटर-गोदरेज
३. डिपार्टमेंट आफ इलेक्ट्रानिक्स (डीओ )
४. फोनेटिक ८६
५. फोनेटिक ८८
६. इंग्लिश फोनेटिक
७. एमटीएनके
८. डीओ फोनेटिक
९. रोमनाइज्ड
१०. ट्रांसलिटरेशन
११. इनस्क्रिप्ट (भारत का अधिकृत कीबोर्ड लेआउट)
१२. नागरी
१३. लिंग्विस्ट
१४. लाइनोटाइप
१५. वेरीटाइपर
१६. मोनोटाइप
१७. काम्पसेट
१८. देवयानी
१९. प्रकाशक
२०. स्क्रिप्ट
२१. वेंचरा
२२. एटेक्स
२३. कंप्यूग्राफिक
२४. वीएसएस
२५ वेबदुनिया
२६. बारहखड़ी
२७. ऑनस्क्रीन
२८. आई-ट्रांस
२९. बरहा आदि आदि।

बापरे बाप! और इन सभी कीबोर्ड लेआउट्स में अलग-अलग ढंग से हिंदी टाइप की जाती है। कम से कम इतने ही और कीबोर्ड लेआउट और होंगे जो मेरी दृष्टि में नहीं आए होंगे। अब इन्हें अलग-अलग ढंग से काम करने वाले हिंदी फोंट्स की संख्या से गुणा कर दीजिए तो पता चलेगा कि हिंदी में कंप्यूटिंग की दुनिया कितनी जटिल और अराजकतापूर्ण है। कहीं कोई नियंत्रण नहीं, कहीं कोई मानकीकरण नहीं। जिसे जिस तरह कंप्यूटर का इस्तेमाल करना हो, करे।

अफसोस की बात यह है कि इस्की और यूनिकोड जैसे मानकीकृत फोंट एनकोडिंग्स (व्यवस्थाओं) के सामने आने तथा इनस्क्रिप्ट जैसे विलक्षण सुविधाजनक, सरल और सक्षम कीबोर्ड लेआउट को भारत के अधिकृत कीबोर्ड के रूप में स्वीकार कर लिए जाने के बाद भी अराजकता की यह स्थिति कायम है। हालांकि फोंट के मामले में तो अब थोड़ा सा अनुशासन देखने को मिल रहा है लेकिन कीबोर्ड! इस मामले में तो माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनी भी हिंदुस्तानी कंप्यूटर उपयोगकर्ताओं की बिगड़ी आदतों के आगे झुक गई है।

माइक्रोसॉफ्ट अपने ताजा आपरेटिंग सिस्टम्स और ऑफिस सॉफ्टवेयर में कई तरह के हिंदी कीबोर्ड को शामिल करने पर मजबूर हुआ है और वह इन कीबोर्ड्स को अपनी बड़ी विशेषता के रूप में प्रचारित भी कर रहा है। लेकिन क्या सचमुच उसने ऐसा करके हिंदी कंप्यूटिंग की सेवा की है? या अलग-अलग कीबोर्डों के रूप में प्रचलित अराजकता को स्वीकृति एवं प्रामाणिकता दे दी है? माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों से आशा की जाती है कि वे कंप्यूटर उपयोगकर्ताओं की सुविधा को ध्यान में रखने के साथ-साथ उन्हें एक अनुशासित व्यवस्था की ओर भी प्रेरित करें। जिस तरह वे यूनिकोड को प्रबल समर्थन दे रही हैं उसी तरह उन्हें इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड लेआउट को भी प्रचारित प्रसारित करना चाहिए था और उसके पक्ष में कंप्यूटर उपयोगकर्ताओं को जागरूक करना चाहिए था।

आज कई लोग कंप्यूटर पर हिंदी में टाइप करने के लिए रोमन में लिखते हैं। इसके लिए उन्हें 'ट्रांसलिटरेशन' नामक कीबोर्ड की सुविधा प्राप्त है, जो माइक्रोसॉफ्ट उत्पादों में भी मौजूद है। सवाल उठता है कि आखिर क्यों किसी हिंदीभाषी को अपनी भाषा में लिखने के लिए किसी दूसरी लिपि की मदद लेनी चाहिए? क्या अंग्रेजी में लिखने के लिए कोई अरबी या रूसी लिपि का प्रयोग करेगा? जब हम इनस्क्रिप्ट पद्धति का इस्तेमाल करते हैं तो कंप्यूटर हमारे लिखे हुए रोमन शब्दों को देवनागरी में परिवर्तित करता है। यह तो ऐसा ही हुआ कि आपको अपने घर में आने के लिए पूरे मोहल्ले में घूमकर आना पड़े। आखिर अंग्रेजी की बैसाखी को अब हम छोड़ क्यों नहीं देते?

ट्रांसलिटरेशन कीबोर्ड के पक्ष में तर्क दिया जाता है कि अपना अधिकांश काम अंग्रेजी में करने वाले या अनिवासी भारतीयों के लिए यह बहुत सुविधाजनक है। लेकिन क्या अनिवासी चीनी या अनिवासी रूसी लोग अपनी भाषा में लिखने के लिए ऐसा करते हैं? आखिर हम हिंदी में हिंदी के ढंग से ही काम करने को क्यों तैयार नहीं हैं? इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड एक बेहद 'इंटेलीजेंट कीबोर्ड' है जिसमें हिंदी टाइपिंग सीखने में मुश्किल से दस-पंद्रह घंटे की जरूरत है। क्या हम अपनी भाषा के लिए ये दस-पंद्रह घंटे नहीं निकाल सकते?

कुछ महीने पहले मेरे पास मेरे हिंदी वर्ड प्रोसेसर 'माध्यम' का प्रयोग करने वाले एक व्यक्ति का ई-मेल आया। उसने लिखा कि मैं पिछले कई महीनों से एक खास ढंग से टाइपिंग में सक्षम सॉफ्टवेयर ढूंढ रहा हूं। मैंने आपका सॉफ्टवेयर इस्तेमाल किया लेकिन वह इनस्क्रिप्ट या रेमिंगटन में ही टाइप करता है। कृपया मदद करें। मैंने उसे जवाब लिखा कि आपने कई महीने एक खास ढंग का कीबोर्ड सक्षम सॉफ्टवेयर ढूंढने में लगाए हैं। यदि आपने सिर्फ तीन दिन इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड में टाइपिंग सीखने में लगाए होते तो आपके लिए सब कुछ कितना आसान हो जाता। आप न सिर्फ एक वैज्ञानिक और मानकीकृत ढंग से टाइपिंग करने लगे होते बल्कि आप यूनिकोड सक्षम भी हो जाते क्योंकि यूनिकोड में भी टाइप करने का अधिकृत कीबोर्ड इनस्क्रिप्ट ही है।

जी हां, जिन आपरेटिंग सिस्टम्स में यूनिकोड के माध्यम से हिंदी में काम करना संभव हो गया है (विंडोज एक्सपी से लेकर विंडोज विस्ता तक, लाइनक्स के एसयूएस , रैड हैट व उबन्तु संस्करण तथा एपल मैकिन्टोश ओएस एक्स आदि) वे सभी इनस्क्रिप्ट समर्थन से युक्त हैं। यकीन मानिए इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड में काम करना इतना ज्यादा आसान और तेज है कि तीन-चार दिन इसका प्रयोग करने के बाद आप इसे छोड़ना ही नहीं चाहेंगे। इसमें खास अक्षरों का निर्माण करने के लिए 'ऑल्ट + १२३' जैसी पचासों याद रखने में असंभव सी कमांड्स देने की भी जरूरत नहीं है। विभिन्न बटनों पर अक्षरों का संयोजन इस तरह किया गया है कि आपको पूरी वर्णमाला के आधे अक्षरों से संबंधित बटनों को ही याद करने की जरूरत है। इस कीबोर्ड में हलंत का बड़ा वैज्ञानिक और रचनात्मक प्रयोग किया गया है जिससे आपको आधे अक्षरों या संयुक्ताक्षरों से संबंधित एक भी बटन को याद रखने की जरूरत नहीं है। समझ लीजिए कि रेमिंगटन जैसे कीबोर्ड में आपको जितने बटन याद करने होते हैं या उसका प्रयोग करते हुए टाइप करने में जितना मानसिक व शारीरिक प्रयत्न करना होता है, उसकी तुलना में इनस्क्रिप्ट में सिर्फ एक तिहाई मेहनत करने की जरूरत है।

ऐसा नहीं है कि कीबोर्डों की यह समस्या सिर्फ हिंदी तक ही सीमित हो। विश्व की कई अन्य भाषाओं में भी एकाधिक कीबोर्ड लेआउट उपलब्ध हैं। लेकिन हिंदी की तरह कीबोर्डों की भरमार कहीं नहीं। विश्व भर में कंप्यूटर विज्ञानियों में इस बात पर एक राय है कि एक से अधिक तरह के कीबोर्ड होना अवैज्ञानिक है। एक दिलचस्प सवाल यह भी पैदा होता है कि आखिरकार हिंदी में स्थितियां इतनी विकट हो क्यों गईं? इसके लिए कुछ हमारी सरकार और कुछ सॉफ्टवेयर निर्माण कंपनियां जिम्मेदार हैं। कंप्यूटरों का प्रचलन होने के कई दशकों बाद तक सरकार को इस बारे में कोई ख्याल नहीं आया कि भारतीय भाषाओं में होने वाले काम को मानकीकृत या प्रामाणिक बनाने में उसकी को भूमिका भी है। किसी मानक के अभाव में सॉफ्टवेयर कंपनियों ने अपनी निजी सुविधा तथा उपभोक्ताओं की पसंद के लिहाज से तरह-तरह के कीबोर्ड लेआउट्स बनाए जो धीरे-धीरे एक वर्ग विशेष के बीच लोकप्रिय हो गए। बाद में बाजार में आने वाली कंपनियों ने अपने सॉफ्टवेयर के उपभोक्ताओं का दायरा बढ़ाने के लिए इन कीबोर्डों को समर्थन प्रदान कर दिया। आज भी कई सॉफ्टवेयर कंपनियां गर्व के साथ कहती हैं कि उनका सॉफ्टवेयर दस या बारह कीबोर्ड लेआउट्स में काम करने की सुविधा प्रदान करता है। यहां तक कि ये लोग यूनिकोड को भी इन लेआउटों के चक्रव्यूह में डालने में जुट गए हैं और अब माइक्रोसॉफ्ट आफिस समेत कई सॉफ्टवेयरों में आप यूनिकोड में भी कई तरह से टाइप कर सकते हैं।

आज जबकि हम यूनिकोड के माध्यम से टेक्स्ट एनकोडिंग में मानकीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, हमें कीबोर्ड लेआउट के बारे में भी एक साहसिक और दूरगामी कदम उठाने की जरूरत है। आज जो सॉफ्टवेयर डवलपर एक ही सॉफ्टवेयर के विभिन्न कीबोर्ड लेआउट्स वाले संस्करण बनाने में बेवजह की ऊर्जा खर्च कर रहे हैं उसका सार्थक उपयोग हो तो शायद हिंदी कंप्यूटिंग की बेहतर सेवा हो सकेगी। इस दिशा में सबसे बड़ी जिम्मेदारी भारत सरकार पर है। उसे चाहिए कि एक कानून बनाकर भाषायी कंप्यूटिंग में एनकोडिंग और टेक्स्ट इनपुट के मानकों का प्रयोग सुनिश्चित करे। सॉफ्टवेयर कंपनियों को चाहिए कि वे अपने उत्पाद सिर्फ इन्हीं मानकों के अनुरूप बनाएं। हम कंप्यूटर उपयोगकर्ताओं को भी अपनी सुविधा का थोड़ा सा त्याग कर इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड लेआउट का प्रयोग सीखना होगा। आखिर क्यों हम हिंदी को पच्चीस कीबोर्ड लेआउट्स की तकनीकी अराजकता में फंसाए रखें?

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